कविता

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गजल

जिन्दगी की धूप छांव
कभी गाड़ी कभी नांव
प्यार की चुभन मिलन
कभी कांटा, कभी पांव
जुल्म की सौगात यही
कभी मरहम , कभी घाव
बैठी है भूख लेकर
कभी पांसे, कभी दांव ।
जारी है तलाशे सुकूं
कभी शहर, कभी गांव ।.

अभिमान

मानव में अभिमान भरा ।
मानवता में स्नेह भरा ।
जहाँ भरा है अभिमान ।
वहां पड़ा है अभिशाप ।
जीवन ही के ढाल है ।  read more »

तीन कविताएं ...

कहीं हम भूल न जाये
इतिहास खुद का
कहीं हम कर न डालें
उपहास खुद का
आनंद शोध का विषय तो
स्वयं विप्र है
कहीं हम खो न दे
विश्वास, खुद का ।

जब भी धर्म से फटा है आदमी
जब भी वर्ण से बंटा है आदमी
रक्त गंगा में ही नहाता रहा है
जब भी सत्य से हटा है आदमी

जीने का अन्दाज बदल डालो  read more »

चेहरे

मैं सौचता हूं
हमारे बाहरी और
भीतरी चेहरों में
इतनी असमानता
क्यों है?

क्यों हम,
होते कुछ हैं,
नजर कुछ और
आते हैं,  read more »

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