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कवर्धा । हिन्दू धर्म के परमपावन त्यौहार दीपावली के उपलक्ष्य में जिला ब्राह्मण समाज कवर्धा का दीपावली मिलन समारोह रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं विभिन्न प्रतियोगिताओं के साथ सम्पन्न हुआ । विप्र भवन के सभगार में जिले के समस्त ब्राह्मण महिला एवं पुरूष उपस्थित होकर एक दूसरे को दीपावली की बधाई एवं शुभकामनाओं का आदान प्रदान किया । इस अवसर पर दो वर्गों में रंगोली एवं ग्रीटिंग कार्ड बनाव प्रतियोगता , फैन्सी ड्रेस एवं गायन प्रतियोगिता का आयोजन हुआ ।
अंत में माननीय डॉ. सियाराम साहू विधायक एवं संसदीय सचिव के मुख्य आतिथ्य में एवं वरिष्ठ अधिवक्ता श्री अम्बिकादत्त तिवारी की अध्यक्षता में सभी विजेताओं को पुरस्कार वितरण किया गया । विशेष आमंत्रित प्रख्यात कवि डॉ. सुरेन्द्र दुबे ने अपने चुटकीले अंदाज में दीपावली की हार्दिक शुभकामनाओं के सात हास्यरस की फुलझड़ी एवं व्यंग्य फटाकों से उपस्थित विप्रजनों को लोटपोट होने में मजबूर कर दिया । उन्होंने स्व. शहीद श्री विनोद चौबे को भावभीनी कविता मयी श्रध्दांजली दी । विशेष अतिथि डॉ. श्रीमती निरूपमा शर्मा के काव्य पाठ को श्रोताओं ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की । कवियित्री सुश्री सुमन शर्मा के उद्बोधन एवं कविता पाठ ने खूब तालिया बटोरी संगीत शिक्षक श्री प्रबुध्द शर्मा एवं श्री तुलेश्वर शर्मा के संगीत कार्यक्रमों ने समा बांधा ।
इस अवसर पर जिला ब्राह्मण समाज के अध्यक्ष श्री लाल जी मिश्रा द्वारा समस्त विप्रजनों को दिवाली उत्सव की हार्दिक शुभकानाएं दी गई । कार्यक्रम में ब्राह्मण समाज कवर्धा की ओर से आमंत्रित सर्वश्री डॉ. सुरेन्द्र दुबे श्री अंबिकादत्त तिवारी सुश्री सुमन शर्मा को आर्डिनेटर पं. सुन्दर लाल शर्मा मुक्त विश्वविद्यालय भाटापारा श्रीमती युक्ता राजश्री झा व्याख्याता रायपुर का शाल एवं श्रीफल से श्री चंद्रिका चौबे, श्री संतोष शुक्ला, सचिव श्री अश्वनी पाण्डेय, श्री जी.पी. अवस्थी, गुरू प्रसाद शर्मा, टी.पी. दुबे आनंद मिश्रा, संतोष तिवारी ने स्वागत किया गया । - कपिल तिवारी

कार्तिक शुक्ल प्रतिदिन को गोवर्धन अन्नकूट और बलिराज नाम से पुकराते है दिन भगवान श्री कृष्ण ने इंद्र के स्थान पर गोवर्धन की पूजा को प्रारंभ किया था इससे कुपित होकर इंददेव ने मूसलाधार जल बरसाया था इससे कुपित होकर इंद्रदेव ने मूसलाधार जल बरसाया था और श्री कुष्ण जी ने गोप और गोपियों को बचाने के लिए अपनी कनिष्टि पर गोवर्धन पर्वत को उठाकर इंद्र का मानमर्दन किया था उनके ही स्मण के लिए गोवर्धन और गौ का पूजन होता है इनकी पूजा के निर्मित आज के दिन श्री कृष्ण ने पके हुये अन्नकूट लगा दिये इसलिए इस दिन का नाम अन्नकूट भी पड़ा।
आज के दिन स्नान करन से पूर्व तेलाभ्यग करना आवष्यक है दिन है दिन में गोवर्धन पूजा कर रात्रि को भूमि में पांच प्रकार के रंगों से बलिराज की मूर्ति बनाकर उसके समीप ही आर्य विंध्यवासिनी कामी सर्वाभरण भूशिता मूर्ति बनानी चाहिए तदन्तर अपने कुटुम्ब के साथ बैठकर गंधाक्षत , पुष्प तथा कमल के हारें से पूजा करें।
इस प्रकार पूजा करके कीर्तन और भजनों द्वारों रात्रि में जागरण करें पूजा के अंत में यथाशक्ति इक्कीस एक सौ एक हजार दीपकों के प्रकार को कौमुदी महोत्सव कहते है इस दिन जो भाव से रहता है वह वर्ष पर्यत उसी प्रकार रहता है यदि आज के दिन दुखी है तो वर्ष भर दुखी रहेगा इसलिए मनुष्य को प्रसन्न होकर इस उत्सव का मनाना चाहिए read more »

कार्तिक अमावस्या को तारों की छाया में स्नान करने का तथा दीपदान करने का महात्व अमावस्या का जब रवि और चंद्रमा एक राशि पर स्थिर होते है तो उस समय सूर्य चंद्रमा के ठीक सिर पर होता है उस समय चंद्रलोक मे निवास करने वाले पितरों के भोजन का समय अर्थात मध्यान्ह काल होता है अत: अमावस्या के दिन अपरान्ह में जो पितृ श्राध्द करते है वही पितरों को रूचिकर होता है।
इसमें पितरदेवों तृप्त होकर अपने कुटुम्बलों को लक्ष्मी स्थिर रहने का वरदान देते है श्राध्द क्रिया के बाद लक्ष्मी पूजन स्थान को सजाना चाहिए और सकुटुम्ब वस्त्रों से सुसज्जित होकर लक्ष्मी को जगना चाहिए हरि प्रवोधिनी एकादशी को भगवान अपनी निद्रा को त्यागा देते है इसलिए लक्ष्मी देवी भगवान विष्णु से पूर्व आज के दिन जग जाती है दीपावली के समय देवी के निर्मित मोम तथा चर्बी की मोमबत्ती जलाना नितातं निषेध है ।

कार्तिक कृष्ण त्रयोदषी को ही धनतेरस कहते है इस दिन नवीन पात्र खरीदने का बड़ा ही महात्व होता है स्मृतियों का कथन है कि धनतेरस के दिन टूटे फूटे बर्तन , टूटी खटियायों दोनों वस्तु लक्ष्मी की वृध्दि चाहने वाले को अपने घर मे नही रखना चाहिए इनके रखने स दरिद्र देव का स्थान प्राप्त होता है सायंकाल को पितरों की प्रसन्न हेतु दीपदान दिया जाता है जिसे पितरों की संतुष्टि होती ह
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दीपदान के उपरातं स्नान कर शुध्द वस्त्र धारण करके चर्तुमुखी चांदी ताम्र अथवा स्वर्ण के दीप पात्र में शुध्द कपास की वर्तिका लेकर दीप प्रज्जवलित करें पुष्प अक्षत से दीपक का पूजन करके स्थिर धन क स्थान पर दीपक की स्थापना करें इस विधि से जो धन त्रयोदषी क दिन कुबेर का दीपदान करते है उसके घर में लक्ष्मी स्थिर होकर विराजमान रहतें है

काट जगत तिमिर पाश । न रहें रंचमात्र संत्रास ॥
अन्तस भर नव उच्छवास । बंदनवार सजे धरा आकाष ॥
शुभ्र ज्योत्स्त्रा दे ज्योति मालिके । जग आलोकित हो दीप वत्तिके ॥
नही उजास अभी तक कुटियों में व्यथा दंश बूढ़ी भुकृटियों में ॥
खेतों खलिहानों के खोये उल्लास सोये अतृप्त यौवन क मधुमास शरत् चन्द्रिका बन धवल रन्ध्रिके जग आलोकित कर दीपर् वत्तिके ॥ न रहे याचना इस बार खुशियों को ही जय यजकार ॥
संकल्प शक्ति दृढ़ मन में भर । लक्ष्य मार्ग स्थित पग धर ॥
अध ,ऊर्ध्व ,चतुर्दिक चलके । जग आलोकित हो दीप वत्तिके । लक्ष्मी को प्रसन्न करिए

कलश का पात्र जलभरा होता है । जीवन की उपलब्धियों का उध्दव आम्र की पत्तियों नागवल्ली द्वारा दिखाई पड़ता है जटाओं से युक्त ऊँचा नारियल ही मंदराचल है तथा यजमान द्वारा कलष के कंठ में बाँधा रक्षा सूत्र ही वासुकी है तथा यजमान और पुरोहित दोनों ही मंथनकर्ता है ।
इसका वैज्ञानिक पक्ष यह है कि यहाँ है कि जहाँ इस धट का ब्रह्माण्ड दर्शन हो जाता है जिससे शरीर रूपी धट से तादाम्य बनता है वही तॉबे क पात्र मे जल विद्युत चुम्बकीय ऊर्जावान बनता है ।
ऊँचा नारियल का फल ब्रह्माण्डीय ऊर्जा का ग्राहक बना है जैसे विद्युत ऊर्जा उपन्न करने वाले के लिए बैटरी या कोशा होती है वैसे ही मंगल कलश ब्रह्माण्डीय ऊर्जा एकीकृत कोशा है जो वातावरण को दिव्य बनती है कच्चे सूत्रों का दक्षिणावर्ती वलय ऊर्जावान को धीरे धीरे चारों ओर वर्तुलाकार संचारित करता है संभवत : सूत्र विद्यत कुचालक अनुसंधान का खुला क्षेत्र हैकि शोधकर्ता आधुनिक उपकरणों का प्रयोग भक्ति एंव सम्मानपूर्वक करें ताकि कुछ और नए आयाम मिल सकें।
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