पत्र

संपादक के नाम पत्र विप्र वार्ता अंक 2010

विप्र वार्ता विप्र का समझाती है धर्म
राष्ट्र देह का विप्र है मुख से मंडित मर्म ।
क्षत्रिय बाहू, वैश्य है उदर रूपव्यवहार।
शूद्र पैर का बन गया सेवाभय आचार ।
महिमा है हर अंग की इसे न जाये भूल ।
कर्ण व्यवस्था है रही अनुशासनमय कूल ।
इच्छुक जो आशी, के दें उनको आशीश ।
आराधक के सामने झुका न अपना शीश ।
सर्वयुवा परिषद बने ब्राह्मणत्व से पूर्ण ।
दंभी का करते रहे दंभ शापमय चूर्ण ।
संस्कार जागृत करें देश बने सम्पन्न ।
दुर्जन जिसको कर नहीं पाये कभी विपन्न ।
मासिक प्रेरक बन करे जन जन का परित्राण।
श्वेता करती कामना सबका हो कल्याण । - डॉ. महाश्वेता चतुर्वेदी, बरेली (उ.प्र.)

विप्र वार्ता का शाकद्वीपीय ब्राह्मण विशेषांक प्रकाशित हो गया हो तो कृपया एक प्रति भिजवाने का श्रम करावे । यदि संभव हो तो वर्ष 2009 के सभी अंक भिजवाने का कष्ट करावे । इस वर्ष एवं आगामी वर्षों की सदस्यता आपको अलग से भिजवा दी जाएगी । - आर.के. शर्मा  read more »

संपादक के नाम पत्र

विप्र वार्ता राष्ट्रीय हिन्दी मासिक पत्रिका आपने मुझे भेजकर कृतार्थ किया है। मेरी समझ से विप्र वार्ता को सिर्फ राष्ट्रीय हिन्दी मासिक पत्रिका न होनी चाहिए बल्कि इसे एक आंदोलन का रूप देना चाहिए । ये कैसे हो सकता
है ? जब सम्पूर्ण दुनिया के ब्राह्मण विप्पल गान पंत जी के अनुसार करेंगे तो दुनिया में जो विचार क्रांति होगी वो सम्पूर्ण जन मानस को आंदोलित व परिवर्तित करने की पृष्ठ भूमि तैयार करेगी ।

ब्राह्मण सिर्फ जाति नहीं है एक विचार गाथा है । ब्राह्मण वही है जिसमें ब्रह्म बनने की क्षमता है और ब्रह्म वही बन सकता है जो जीवन के लक्ष्मी विचार धारा का प्रस्फुटन करता है । सर्व युवा ब्राह्मण परिषद के कुछ करने की टीस है, जिसे आपकी भाषा में शायद ललक या इच्छा
है ।

गौतम, कोरबा  read more »

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संपादक के नाम पत्र

सर्व युवा ब्राह्मण परिषद का मुख पत्र विप्र-वार्ता ब्राह्मणों को जागृत करने के लिये अच्छी पत्रिका प्रकाशित की गई है, जिसके लिए मार्गदर्शक एवं सभी प्रतिनिधि मंडल बधाई के पात्र है, आज का समय ब्राह्मण परिवार के सदस्यों के लिए बड़ी चुनौती का समय है, इस पर हम सबकों मिलकर चिंतन करना आवश्यक हो गया है कोई विशेष बात नहीं बुध्दिजीवी माना जाने वाला ब्राह्मण अहंकार का त्यागकर सिर्फ अपने समाज के लिए कुछ कर जायें तो आने वाला हमारा भविष्य सुख-शांति से व्यतीत कर सकेंगें अन्यथा इस स्थिति में ईश्वर ही रक्षा करें छत्तीसगढ़ राज्य बनने के पश्चात् प्राय: यहाँ सभी प्रांतो से आकर बसने वाले ब्राह्मण अपना जीवन-यापन मिल-जुलकर कर रहें हैं, लेकिन आज भी वो मानसिकता बनी हुई है, कि हम छत्तीसगढ़िया है, वो परदेसिया है  read more »

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संपादक के नाम पत्र विप्र वार्ता अंक फरवरी 2009

विप्र वार्ता का अक्टूबर दिसम्बर 08 अंक प्राप्त हुआ आभार। संपादकीय प्रभावी है, विशेषकर अंक 32-33 का ।
आलोक पाण्डेय जी का राम रामायण एवं शैलेन्द्र शर्मा का छोटा होता अरूण पठनीय है । इस संबंध में आत्मचिंतन की बहुत आवश्यकता है ।

महाकूंभ की रपट, उत्साहवर्धक है। श्री संजय तिवारी की आव्हान कविता एवं डा. दुबे की दुर्गास्तुति अच्छी लगी ।

नववर्ष की मंगलकामनाओं सहित
आनन्द बिल्थरे (कवि, लेखक, समीक्षक), बालाघाट

ब्रह्म भट्ट समाज भिलाई द्वारा आयोजन पढ़कर आत्मिक प्रसन्नता हुई। इसी प्रकार समय समय पर ब्राह्मण समाज द्वारा विभिन्न स्थानों पर कार्यक्रम आयोजित होते रहे जिससे समाज मेंब्राह्णों ज्ञद्रलह्णलउ* की छवि प्रभावी होगी । यद्यपि आज मंत्री मण्डल में ब्राह्मणों को नहीं शामिलकिया गया किन्तु कल हमारा ही होगा । आज आवश्यकता इस बात की है कि हर स्थान पर जहां ब्राह्मण समाज का अपना भवन नहीं है वहां भवन वश्य निर्मित हो ।  read more »

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