पर्यावरण दिवस पर प्रदूषित होते जीवन को सुधारे

प्राकृतिक पर्यावरण संतुलन की उपेक्षा की जा रही है कहीं ऐसा ने हो कि एक दिन इस भयंकर भूल का खामियाजा हमें और हमारी भावी पीढ़ी को गलघोंटू, दमा, सांस, टी.वी. , खासी , कफ, हिस्टीरिया, व अस्थमा जैसी गंभीर जानलेवा बीमारियों द्वारा जकड़ लेने के कारण ये ही प्राकृतिक पर्यावरण असंतुलन हमारे लिए मानसिक असंतुलन और भावनात्मक बिखराव का कारण बर जाए ।

हमारे द्वारा आज केवल हवा, पानी, वृक्षों, नदियों , जंगलों पर्वतों आदि को ही पर्यावरण का हिस्सा मानलेने की मारसिकता मात्र ने ही पर्यावरण असंतुलन की समस्या को जन्म दिया है । आज हमें अपनी मानसिक सोच में परिवर्तन लाने की अत्यंत ही आवश्यकता है और हमें पर्यावरण को भी अपने शरीर का अभिन्न अंग तथा वृक्षारोपण व हरियाली ही मानव के जीवन की रेखा है जैसी कठू सत्यता को भी समझना होगा ।

यह बड़े ही दु:ख की बात है कि हमें प्रदूषण की भयानकता के बारे में मालूम होने के बावजूद भी हम आधुनिकता की अंधी दौड़ में जान-बुझकर हम इसके मित्र बन बैठे हैं । आज हम अपने आस-पास के रहन-सहन, खान-पान, वातावरण व संस्कृति को भी भूलते जा रहे हैं । शहर में खान-पान अपने आस-पास के रहन-सहर का वातावरण मिलना भी दिन-प्रतिदिन दुर्लभ होता जा रहा है ।

प्रदूषण की रोकथाम के लिये जहां सरकार की जिम्मेदारी बनती है वही स्वयं सेवी संस्थाओं और संगठनों को भी आगे आकर स्थानीय लोगों के सहयोग से पर्यावरण के प्रति जन-साधारण को जागृत एवं शिक्षित करने इससे पैदा होने वाली जानलेवा हानिकारक बीमारियों और तत्वों की जानकारियों देते रहने शुध्द वायु व स्वच्छ रहन-सहन के वातावरण के बारे में समझाते रहने, वृक्षारोपण करने की आवश्यकता है । नैतिकता के आधार परइस ओर अपनी अहम भूमिका निभानी चाहिए । जब तक हम सब अपने इन कर्तव्यों को नहीं समझेंगे तब तक हमें प्रदूषण रुपी दानव को समाप्त करने में सफलता प्राप्त नहीं हो सकेगा ।

आज वनों और पेड़ों का अवैध कटान, बेहताशा वाहनों का बढ़ना अनियंत्रित झोपड़ी-पट्टी कॉलोनियों का निर्माण, बड़े पैमाने पर औद्योगिक प्रदूषण जानवरों की निर्मम हत्या, जनसंख्या विस्फोटक बढ़ता शहरीकरण , नदियाँ तालाबों में बढ़ता जल प्रदूषण आदि प्रकृति से खिलवाड़ नहीं तो और क्या है जब चीटीं जैसे छोटे से छोटा जीवन भी प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने के लिए हर संभव प्रयास करता है ताकि उसका अपना अस्तित्व सुरक्षित रहे तो फिर हम क्यों बिगाड़ रहे हैं जिस प्रकार हमारे जीवन में जीवनपयोगी वस्तुओं की आवश्यकता है ठीक उसी प्रकार पेड़ पौधों पर होने वाले अन्याय एवं क्रूरतापूर्ण अत्याचार के विरुध्द उनकी सुरक्षा के लिए आगें आयें और आवाज उठायें । ये बोल नहीं सकते लेकिन हम इनकी आवाज तो उठा सकते हैं ।

आइये वृक्ष लगाएं -प्रदूषण भगायें : हरित क्रान्ति हरा ही हरा पेड़ लगाओं -वर्षा उगाओं मानव को पर्यावरण को भी शरीर का अभिन्न अंग मानना होगा, वृक्षारोपण व हरियाली ही मानव के जीवन की रेखा है , जल प्रदूषण मानव जीवन के लिएखतरा है , व्यासी धरती करे पुकार-वृक्ष लगाकर करें श्रृंगार, पानी-बिजल बचाइये-वातावरण को चबाइये वातावरण को स्वच्छ और सुंदर बनाईये वृक्ष है जहां-हरियाली है वहां जीवन एक धोखा है पेड़ लगाओं मौका है । जले है तो कल है -पेड़ है तो पल है एक वर्ष एक वृक्ष , वृक्ष लगाएं -आयु बढ़ाएं प्लास्टिक उपयोग छोड़िये - पर्यावरण को बचाइये जैसी सार्थक भावनाओं को समझे । इसी में राष्ट्र और हम सबकी भलाई है, अन्यथा एक दिन इसकी भारी कीमत हमारी वर्तमान एवं भावी पीढ़ी को भुगतनी पड़ेगी ।

- विवेक बाजपेयी
प्रतिनिधि विप्रवार्ता, गौशालापारा, रायगढ़

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