
राहुल गांधी ने मंत्री पद ठुकराकर श्रेष्ठ कार्य किया
भारत के राजनीतिज्ञ अपने चरित्र से देश को नीचे ले जा रहे हैं । उनके लिये चुनाव केवल सत्ता पकड़ने का हथियार बनकर रह गया है भारत के राजनीतिज्ञ के लिये । जिसके लिए वे वही सब कुछ कर रहे हैं जो अनैतिक है राष्ट्रीयता के विपरीत है और आचार संहिता के भी विपरीत है । ऐसे नेता चुनकर जायेंगे जो देश को कहां ले जायेंगे, यह चिन्ता का विषय बन गया है । इनके हाथों हमारे स्वतंत्र भारत का क्या हश्र होगा ? स्वतंत्रता संग्राम में किये गये बलिदान का क्या होगा ? क्या हम उनके बलिदान से प्राप्त स्वतंत्र भारत की रक्षा कर पायेंगे या पुन: गुलामी और साम्राज्यादी शोषण में जकड़ जायेंगे ?
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और चिंतक भयभीत हैं लेकिन इससे काम नहीं चलेगा उनहें कोई राह निकालनी ही होगी । इसके लिए उन्हें स्वंय को खाद बना देना होगा ताकि नई पीढ़ी उस पर फल फूल कर देश को एक खुशहाल एवं सुदृढ़ प्रजातांत्रिक राष्ट्र बना सके तथा अपने वसुधैव कुटुम्बकम के लक्ष्य को पूरा कर सके ।
भारत लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की टीम ने पद भार ग्रहण कर लिया है । इसमें राहुल गांधी नही हैं ।इस बार मिले जनादेश से प्रधानमंत्री पहले से कही अधिक मजबूत हुए हैं । राजनीतिक चुनौतियां तो अभी भी है परन्तु सरकार अस्थिरता का खतरा पहले से कम ही है । नई सरकार को सतर्कता बरतते उम्मीदों पर खरा उतरना होगा । इन्हीं उम्मीदों को पूरा करने के उद्देश्य से जनता ने बड़े भरोसे से कांग्रेस को बहुमत के साथ सत्ता सौंपी है । पिछली बार के मुकाबले सांसदों का संख्या बल सरकार को मजबूती दे रहा है । इस बार यूपीए के 262 व कांग्रेस के 206 सांसद सदन में निर्वाचित होकर आए हैं । इस चुनाव में दिया गया जनादेश सरकार को अपनी नीतियों और योजनाओं को लागू करने के लिए पर्याप्त छूट देकर अधिकार संपन्न बनता है । उसे कर्मठता का परिचय देकर जनविश्वास को कायम रखना होगा । जनता का भरोसा पाने के लिए राजनीति को लोकाभिमुख बनाते हुए सेवाभाव व ईमानदारी के साथ काम करना आवश्यक है ।
नई सरकार के समक्ष आंतरिक सुरक्षा की दृष्टि से कई चुनौतियां है । आतंकवाद सबसे बड़ा खतरा है । यह समस्या बाहीर व आंतरिक दोनों है ।फिलहाल शांति की मुख्य वजह मुंबई हमले के बाद पाकिस्तान पर बढ़ा अंतर्राष्ट्रीय दबाव है । आर्थिक चुनौतियां घरेलू व वैश्विक दोनों मोर्चों पर है. वैश्विक मंदी के दबाव में हमारी अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन भी कम है । निर्यात में जहां गिरावट आई है वहीं उद्योग भी खतरे में है जिसके कारण रोजगार के अवसर अपेक्षाकृत कम हुए हैं । अर्थव्यवस्था को सुधारने राजनीतिक सहमति बनाना होगा । देश में व्याप्त भ्रष्टाचार व अव्यवस्था पर अंकुश लगाना भी सरकार के समक्ष एक बड़ी चुनौती है । राहुल गांधी ने भी भ्रष्टाचार को इस देश की बड़ी समस्या माना है । राहुल गांधी की इच्छानुरूप ग्रामों में खर्च होने वाली रकम को दस फीसदी से बढ़ाकर पचास फीसदी भी कर देते हैं तो यह बड़ी उपलब्धि होगी ।
कांग्रेस को मिले जनादेश से राहुल गांधी की पार्टी में ताकत बढ़ी है । सत्ता सूत्रों के संचालन में उनकी अहम भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है । उन्होंने मंत्री पद को ठुकराकर श्रेष्ठ कार्य किया है । उन्हें मंत्रियों व मंत्रालय के कामकाज पर तीक्ष्ण निगाह रखनी चाहिए । जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने पर कांग्रेस अगली बार बड़ी ताकत के रूप में उभर सकती है । यदि ऐसा हुआ तो इसका श्रेय युवा राहुल को ही जायेगा ।
धनंजय त्रिपाठी, संपादक
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