बसंत की चर्चा बसंत में और अदिक मुखर हो जाती है । बसंत का संदर्भ सरस्वती पूजा से जुड़ा है। सरस्वती को विद्या और ज्ञान की देवी माना गया है ।
जैसे शिशिर और हेमंत से ठिठुरती और धुंध, को हरे से भरी धरती पर बसंत के आगमन के साथ ही एक नई आभा प्रस्फुटित होने लगती है उसी तरह अविद्या और अज्ञान के अंधकार से ग्रस्त व्यक्ति के जीवन में विद्या और ज्ञान से एक नया प्रकाश जगमगा उठता है । विद्या व्यक्ति को मुक्त करती है ।
कहा भी गया है सा विद्या या विमुक्तये । विद्या व्यक्ति को विनय देती है । लेकिन कई बार पाया यह जाता है कि विद्या और ज्ञान पाकर व्यक्ति अहंकार से ग्रसित हो जाता है । उसके मन की निर्मलता और निश्छलता कहीं लुप्त हो जाती है । वह सहज और सरल नहीं रह पाता । व्यावहारिकता और दुनियादारी उसे चतुराई और चालाकी की ओर प्रवृत्त करती है । अपनी विद्या और ज्ञान के बल पर वह अपढ़ किन्तु सरल व्यक्ति को मूर्ख बनाने लगता है पर यह भी निश्चित है कि अंतत: सरलता ही व्यक्ति के काम आती है ।
शायद इसी संदर्भ में कबीर ने कहा है - 98183-0359059.
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय ।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंडित होय ॥
हमारे मानवीय रिश्तों में प्रेम और सौहार्द की उपस्थिति अनिवार्य है । पारिवारिक और सामाजिक संदर्भों में रिश्ते औरसंबध प्रेम की बुनियाद पर ही टिके हैं । विद्या की सार्थकता यही हैकि वह इस बुनियाद को और अधिक सुदृढ़ बनाए । विद्या को मनुष्यता की कसौटी पर लगातार कसते रहने की जरूरत होती है ताकि हमारी निश्छलता पर कोई आंच न आए । निश्छल जीवन शैली विद्या से भी अधिक महत्वपूर्ण है ।
शास्त्रों की घातकता के पीछे धन की शक्ति कम ,31.8.1986,शांडिवय विद्वत्ता की शक्ति ज्यादा घातक और भयावह रूप से विद्यमान मिलती है। बाहर से विद्वत्ता ,23.8.1982भारत ज्ञान और सूचना का आयात इसी घातकता में वृध्दि करने का हेतु है । इसीलिए सूचना तकनीक के युग को ज्ञान निर्भरयुग की संज्ञा दे हमें अपनी सरस्वती की अंदरूनी खबर और उस पर कड़ी नजर रखनी चाहिए । यह घातकता जब अपने समग्र रूप ले लेगी तो न सरस्वती बचेगी न लक्ष्मी और न मनुष्य ।
बुध्दि और तर्क। मनुष्य में सदैव से दानवीय शक्तियों का आव्हान करते रहे है । रावण छोटे से द्वीप का शासक था । यह द्वीप भी उसने विद्वत्ता के बल पर प्राप्त किया था । पहले विद्वत्ता के बल पर उसने पौरोहित्य की पात्रता प्राप्त की ठीक वैसे ही जैसे असाधारण मेधा के धनी युवा प्रशासनिक और प्रबंधकीय उत्तरदायित्व वाले पदों पर चुने जाते हैं और फिर अपनी सरस्वती के बल पर अपने विरल वैभव के अद्वितीय दुस्तर द्वीप विरचते जाते हैं और इनकी रचना में नीति अनीति, युक्ति राजनीति, कूटनीति, विद्याबल, धनबल, और आवश्यक हो तो देहबल और युवतर आयुबल का भी समुचित उपयोग करते चलते हैं और प्रौढ़ अपने ययातित्व और अनुभवका भी मिश्रण इन द्वीपों की रचना में कर देते हैं जैसे किसी काल में दशानन ने शिव से दक्षिणा के रूप में पूरा स्वर्ण द्वीप ही प्राप्त नहीं कर लिया अपितु अपने बल के मद में कुबेर से उसका खजाना और विमान भी झटक लिया ।
रावण कुछ विद्वता भरी चालाकी के बल पर तो कुछ धन के वैभव के बल पर दिक्पालों तक से पानी भरवाने में समर्थ था । आज जिस प्रकार तीसरी दुनिया के देशों के शासक विकसित देशों के दरबार में उनकी कृपा, उनके अनुदान, उनका समर्थन और उनके नीति निदेश तक पानेको विनत रहते हैं जिन नीति निर्देशों से वे अपने देश की सामाजिक आर्थिक व राजनीतिक व्यवस्था करने के लिए वचनबध्द और संधिबध्द होते हैं । उनके इस दासत्व या गलती से जिसे उनकी संप्रभुत्ता तक समझ लिया जाता है। उस विनत संप्रभुत्ता रूपी महामहिमत्व के पीछे भी दोनों ही शक्तियां कार्यरत हैं -0512-250194470. लक्ष्मी की भी और सरस्वती की भी ।
लक्ष्मी के बल पर जिन्होंने सरस्वती की कृपा प्राप्त की है और सरस्वती के बल पर जिन्होंने लक्ष्मी की कृपा प्राप्त की है,1.8.1988, हमारे समाज में ये दो वर्ग ही प्रभुताशाली बनकर े982693518भरे हैं जिनसे पूरे समाज को दासत्व ही नहीं विनाश का भी खतरा है । दासत्व का खतरा ही रहता तो हम किसी तरह झेल भी जाते । दास होकर रहने में भी कहीं जीवन हो, तो शुक्र। है ।खास तौर पर जो विद्वत्ता लक्ष्मी के बल पर उपजी हुई है वही मनुष्य व जीवन के प्रति सर्वाधिक संवेदनहीन है और यही विद्वत्ता विश्वके लिए ज्यादा खतरनाक है । ज्ञान के लिए धन और जहां धन की कमी पड़ेगी वहां उच्च शैक्षकि ॠण तो लक्ष्मी व सरस्वती की इस दुरभिसंधि केबीच से जो मनुष्य आकार लेगा, वही प्राणिमात्र के प्रति सर्वाधिक संवेदनशून्य होगा । यह लक्ष्मी और सरस्वती का ऐसा कूटनीतिक तंत्र होगा जो मनुष्यता को विवश करके रख देगा ।
इसके विपरीत ज्ञान यदि हमारी मानवीय मूर्खताओं में से आकार ले रहा हो तो यह रचनात्मक सिध्द हो सकता है । रचनात्मक न भी हो, कम से कम यह रक्षात्मक अवश्यक होगा । संभावना और आशंका का उल्लेख होता है कुतर्कों में । दरअसल आक्र।31.मण की मंशा के आगे तर्क। ठहरते ही नहीं, फिर भी आक्र।मण को वैध व नैतिक ठहराने का कुतर्क गढ़ा जाता है , क्योंकि वह बलशक्ति है. जिसके पास शौर्य हो तो बुध्दि स्वयमेंव आ जाती है । अगर धनवान को बुध्दि आ जाएतो उसके तर्क बड़े ही वंचक होते हैं ।
जीवन पथ को पाने के लिए जिस बुध्दि की आवश्यकता है । वह वज्र मूर्खता में भी प्रकट हो सकती है । और यह वज्र मूर्खता जब दमककर विद्वत्ता पर गिरती है तब विद्वत्ता पानी भी नहीं मांगती । कौंआ एक ऐसा मूर्ख प्राणी माना गया है जो दूसरों के अंडे को अपनी ममता से सेता है लेकिन उसके द्वारा बरती गई मूर्खता से जीवन बाधित नहीं होता ।
धन विद्या और बल संपन्न लोगों ने अपने चक्रबर्ती की लालसा लेकर अश्वमेध का घोड़ा छोड़ दिया है । घोड़ा देश देश घूम रहा है । कहीं उसका स्वागत तो कहीं विरोध । कुछ दुस्साहसी लोग उस घोड़े को पकड़ लेते हैं और मार दिए जाते हैं । फिर किसी अन्य देश में यह छोड़ा जाएगा और इस प्रकार चक्रवर्ती महत्ताकांक्षाओं का यह घोड़ा विनाश चक्र को पूरा करते हुए घूमता रहेगा ।
ऐसे घातक समय में जड़ता को उम्मीद से निहारने में क्या बुरा है 5 कौन सी मूर्खताएं और कौन सेआलस्य सृष्टि को बचाने के उपक्रम में फलदायी हो सकते हैं 5 हो सकता है कि किसी जड़ को कोई जटिल युक्ति सूझ ही जाए और बौध्दिकता के इस महासमुन्द्र या तालाबको हम उसकी लुटिया भर बुध्दि के खालीपन के सहारे तर ही जाएं । तर न भी सकें तो जीवन भर डूबते उतराते रहें, इसके लिये थोड़ी सी बुध्दि लुटिया भर बुध्दि काफी है । वह एकमात्र सरस्वती है जो हमारी आसन्न मृत्यु को टालकर हमें जीवन दे सकती है । कम से कम अपनी अपनी सरस्वती की यह आंतरिक खबर तो हम सबको रखनी चाहिए ।
संकलन- शैलेन्द्र शर्मा
साभार- आजकल
Comments
Post new comment