अगस्‍त 2009

भारत के जन मानस पर तुलसी का अधिकार

गोस्वामी तुलसीदास हिन्दी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल की सगुण भक्ति शाला की राम काव्यधारा के प्रतिनिधि कविके रूप में आदरणीय हैं । तुलसीदास रामचरित मानस जीवन की समग्रता को लेकर चलने वाली एक कालजयी रचना है जिसकी जड़े भारत की धरती में है । मानस आज अत्यधिक लोकप्रिय तथा जन जीवन के सर्वाधिक निकट लक्षित होता है ।

मानस के माध्यम से हमारे इस लोकप्रिय कवि का मूल उद्देश्य सामाजिक जीवन में उन मान्यताओं, मर्यादाओं एवं मूल्यों को स्थापित करना है जिनसे समाज का मंगल हो तथा वह समृध्दिशाली शक्तिशाली बने ।

आज का मनुष्य मन यांत्रिक सभ्यता और वैयक्तिकता के परिवेश से जुड़ा है । वह मशीन और वासनाओं का क्रीतदास बन बैठा है । वर्तमान में मनुष्य की आस्था का केन्द्र धर्म और दर्शन न होकर भौतिकवाद (विज्ञान) हो गया है। उपभोक्तावादी अपसंस्कृति के दुष्परिणाम स्पष्ट रूप से दिख रहे हैं ।  read more »

शाकद्वीप एवं शाकद्वीपीय ब्राह्मण की अवस्थिति

सप्तद्वीप वसुन्धरा आदि आप्त वचनों से सिध्द है कि यह पृथ्वी सप्तद्वीपों एवं क्षीरादि सप्त सिन्धुओं से घिरी है, जिनका ज्ञान कराने में आज विज्ञान भी असमर्थ है । पुराकाल में अपनी तपस्चर्या के बल से ऋषिगण द्वीपों को प्रत्यक्ष कर लेते थे ।

भारतीय प्राक् भौगोलिक वर्णन में सात द्वीपों का वर्णन इस प्रकार है - जम्बू द्वीप, प्लक्षद्वीप, शाल्मलिद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप और पुष्कर द्वीप । उक्त सात द्वीपों में एक द्विव्यद्वीप भी है जहां के निवासी भी दिव्य है । वह द्वीप भी क्षीरसागर से परिवृत है , जिसे शाकद्वीप कहते हैं । शाकद्वीप का विस्तार बत्तीस लाख योजन है और उतनी ही विस्तार का उसके चारो ओर विशाल शाक नामक वृक्ष है, जिससे उसका नाम शाकद्वीप पड़ा है । उस वृक्ष में बड़ी सुगन्ध है, जिससे समस्त द्वीप सुगन्धित रहता है ।

उसका स्वामी प्रियव्रत का पुत्र मेधातिथि था । उसने उस द्वीप को अपने पुत्रों के समा नाम वाले सात भागों में बांटकर एक एक में एक एक पुत्र को राजा बनाया । उन पुत्रों का नाम पुरोजन, मनोजन, पवमान, धूम्रानीक, चित्ररेफ, बहुरूप और विश्वाधार थे । इनकी सीमा में पर्वत सात है और सात ही प्रसिध्द नदियाँ है । पर्वतों में ईशान, उरूश्रृङ्ग, बलभ्रद, शतकेसर, सहस्रस्रोत देवमाल और मानस है । नदियों का नाम अनघा, आयुर्दा, उभयस्मृष्टि, अपराजिता, पच्चपदी, सहस्रश्रुति और मदानस हैं । सर्वप्रथम मेरू का स्थान शाकद्वीप सर्वप्रथम सृष्टि का स्थान शाकद्वीप तथा वर्णाश्रमों मे ंप्रथम ब्राह्मणों की उत्पत्ति का स्थान शाकद्वीप है ।  read more »

शाकद्वीपीय ब्राह्मण

ऋक, वाक्य ब्रह्म जानाति इति ब्राह्मण: से स्पष्ट है कि ब्राह्मण जाति ही नहीं, बल्कि एक संस्कृति संस्कार है । सामाजिक व्यवस्था के अंतर्गत यह शब्द जाति सूचक हो गया जो तत्कालीन सामाजिक कारणों से विभिन्न वर्गों में विभक्त होता गया । यद्यपि पौराणिक ग्रंथों में ब्राह्मण ही उल्लिखित है परन्तु वेद पुराणों में शाकद्वीपीय ब्राह्मणों का विभिन्न संदर्भों में उल्लेख मिलता है ।

वेद- पुराणों में उपलब्ध विवरणों से यह निष्कर्ष निकलता है कि सुर्यांश से उत्पन्न ब्राह्मण (ऋतव्रत) शाकद्वीप में निवास करते थे तथा (योनिज न होने से ) दिव्य कहलाये । सूर्य के तेजोमय अंश से उत्पन्न शाकद्वीपीय ब्राह्मण अग्रणी सूर्योपासक माने जाते हैं । मनुस्मृति के अनुसार सूर्यास्त के बाद श्राध्दकर्म वर्जित है । ऐसी स्थिति में शास्त्रवचन है कि शाकद्वीपीय ब्राह्मण को सूर्य के रूप में वरण करके सूर्यास्त के बाद भी श्राध्दकर्म सम्पन्न करना चाहिए । यह उनकी विशिष्टता और दिव्यता को दर्शाता है । तंत्र (अध्यात्म) और प्राचीन िकित्सा पध्दति पर इनका एकाधिकार था ।

यही कारण था कि भगवान द्वारा नियोजित एक घटना क्रम में, श्रापजनित कुष्ठरोग से पीड़ित श्रीकृष्ण पुत्र साम्ब की तांत्रिक (आध्यात्मिक) चिकित्सा के लिए शाकद्वीप से शाकद्वीपीय ब्राह्मणों के अट्ठारह परिवारों को सादर जम्बू द्वीप लाया गया था । चिकित्सा से साम्ब के रोग मुक्त होने पर ये विख्यात हुए ।  read more »

गोत्र- पुर विचार

जम्बूद्वीप में दीर्घ काल से निवास कर रहे तथा जन्म कर्म धारण करन ेपर शाकद्वीपीय ब्राह्मण भी जम्बूद्वीपीय सदृश हो गये हैं । कुछ क्षेत्रों में यह धारणा है कि पुर भिन्न होने पर समान गोत्र में विवाह करना निषिध्द नहीं है ।

इसके विपरीत कुछ क्षेत्रों में समान गोत्र में विवाह को निषिध्द माना जाता है। इससे सहज प्रश् उठता है कि शाकद्वीपीय ब्राह्मणों को पुर भिन्न होने पर सगोत्रीय विवाह क्यों करना चाहिए ? और क्यों नहीं करना चाहिए ? जबकि जम्बूद्वीपीय शाकद्वीपीय ब्राह्मणेतर ब्राह्मणों मे ंसगोत्रीय विवाह निषिध्द है । यह प्रश्न विचारणीय और समाधेय है ।

ज्ञातव्य है कि एक विशे, काल में शाकद्वीपीय ब्राह्मणों की उत्पत्ति भगवान सूर्य के अंग से हुई है न कि मन्वादि-दक्षादि प्रजापतियों से । यथा -

सृजामि प्रथमं वर्णं मगसंज्ञमनौपमम्
इत्युक्त्वा तमहं वीर राजानं खगसप्तम् ॥22॥  read more »

सकरमण मग भोजक ब्राह्मणों की प्रतिष्ठा परम्परा उत्पत्ति एवं इतिहास

हर समाज में कुछ ऐसी परम्पराएं हैं, जिसेक पीछे गहरी अर्थ एवं इतिहास छुपा होता है । शाकद्वीपीय मग भोजक ब्राह्मणों में एक गोत्र है सकरमण । सकरमण गोत्र कैसे बना, इस पर हम अलग से विचार करेंगे । जैसलमेर, पोकरण, फलोदी क्षेत्र में पुष्पकरणा ब्राह्मणों के न्यात, ओसर, नुखता कोई भी होता है । उस समय जब कड़ाई मे ंशकर डाली जाती है, तब सबसे पहले कढ़ाई में शक्कर की पतासी भरकर सकरमण गौत्र के मग भोजक ब्राह्मण द्वारा डाली जाती है ।

फिर न्याति के चौधरी उसमें डालते हैं यह परम्परा फलौदी में जहाँ अभी सकरमण परिवार के लोग रहते हैं । बदसतुर होती है । बाप, नोख, मलार, लोड़िया आदि में न्यात होने पर भी सकरमण मग भोजक को ले जाते हैं । यह परम्परा क्यों और कैसे किस राजा के काल से चालू हुई ? यह कहना कठिन है । इस पर खोज कि याजा सकता है ।

फलोदी निवासी मधुयाड़ा (रासोणी) श्री रामचन्द्र बहुत अनुभवी एवं गुणी, वयोवृध्द विद्वान है । श्री कमला पत्नी रामचन्द्र जी शांडिल्य की क्रिया 10.5.09 को समाज के गुणीजनों के आगे चर्चा के समय उन्होंने मुझे यह बताया कि एक बार इस क्षेत्र के किसी राजा के समय राजा पुष्करणा ब्राह्मणों से नाराज हो गया । उसने न्यात के चौधरियों को जैल मे ंडाल दिया। किसी को देश निकाला दे दिया । किसी को मारा, पीटा वृत बाड़ी भी बन्द करा दी । इस समय शंकरलाल जी नामक विद्वान कवि थे ।  read more »

सूर्यदेव: विज्ञान सम्मत प्रत्यक्ष देवता

सूर्य विज्ञान समम्मत देवता है । सूर्यदेव ही लोकजीवन के साक्षी और सांसारिक प्राणियों की ऑंखों को प्रकाश देने वाले हैं । इसलिए, उनको लोकसाक्षी और जगच्चक्षु कहा गया है । निरूक्त के अनुसार वह आकाश में परिभ्रमण करने के कारण ही सूर्य की संज्ञा प्राप्त करते हैं । वही लोक को कर्म की ओर प्रेरित करते हैं तथा लोकरक्षक होने से ही रवि के नाम से उद्धोषित होते हैं ।

प्राचीन वैदिक ऋषि मुनि से आधुनिक वैज्ञानिक तक सूर्य के भौतिक एवं आध्यात्मिक गुणों से सम्यक्तया परिचित रहे हैं । इसलिए सूर्य से भावघनिष्ठ संपर्क स्थापित करने के निमित्ति उन्होंने सूर्योपासना को विश्वधर्म और संस्कृति का अनिवार्य अंग बना दिया । फलत: सूर्य सम्पूर्ण विश्व के लिए अधिष्ठातृदेव के रूप में अंगीकृत हो गये । रोग के जीवाणुओं के शमन के लिए तो सूर्यकिरणों की उपयोगिता चिकित्साशास्त्र सम्मत है । आरोग्य कामना, निर्धनता निवारण, सन्तति प्राप्ति आदि की दृष्टि से तो सूर्य की पूजा और उनके स्तोत्रों के पाठ का व्यापक प्रचलन है ।

कर्मकाण्ड और तन्त्राचार या आगमिक पध्दति में सूर्य को प्रथमपूज्य देव की प्रतिष्ठा प्राप्त है । सूर्य की अर्ध्य निवेदित करने के बाद ही दैवकार्य या पितृकार्य का विधान सर्वमान्य है । योगासनों में भी सूर्य नमस्कार का अतिशय महत्व है । इस प्रकार, सूर्य निस्सन्देह जागतिक जीवों के प्राणपोषक, सर्वसम्प्रदाय सम्मत, लोकतान्त्रिक अजातशत्रु देता है । शास्त्र पुराणों में ऐसा निर्देश है कि जो व्यक्ति प्रतिदिन सूर्य को नमस्कार करता है , वह हजार जन्मों में भी दरिद्र नहीं होता ।  read more »

Shailendra Sharma's picture

श्रावणी पूजा विधि विधान से संपन्न

गुजराती ब्राह्मण समाज रायपुर द्वारा प्रतिवर्षानुसार अपने रक्षाबंधन पावन पर्व पर आयोजित कार्यक्रम में सामूहिक यज्ञोपवित संस्कार एवं बह्मभोज का आयोजन किया । क्षत्रीय जातीय सेवा समिति धर्मशाला में ब्रह्म समाज के लोग बड़ी संख्या में शामिल हुए और श्रावणी पूजा विधान के अनुसार संपन्न कर अपने धारण किये हुए जनेऊ को परिवर्तित किया ।  read more »

Dhananjay Tripathi's picture

शाकद्वीपीय ब्राह्मण विशेषांक - एक विवेचन

ब्राह्मणों के विभिन्न वर्गों में शाकद्वीपीय ब्राह्मण एक महत्वपूर्ण वर्ग है इन्हें मग ब्राह्मण भी कहा जाता है, विप्रवार्ता ने विभिन्न वर्गों के ब्राह्मणों पर विशेषांक निकालने का निर्णय लिया है । शाकद्वीपीय ब्राह्मण विशेषांक उसी माला का पहला मोती है ।

पहली कड़ी है इस संबंध में हमें बीकानेर, जोधपुर, जयपुर, उदयपुर, जालना, जलशोक और औरंगाबाद जशपुर से विभिन्न लेख प्राप्त हुए । इन सारगर्भित और प्रामाणिक लेकों को हम इस विशेषांक में प्रस्तुत कर रहे हैं ताकि हम अपने समाज का इतिहास संस्कृति और लोक व्यवहार को जान सके ।

किसी व्यक्ति अथवा संस्था पर व्यक्तिगत कटाक्ष करना हमारा उद्देश्य नहीं है किन्तु कुछ ज्वलंत मुद्दों पर हमें सोचना होगा ..  read more »

Shailendra Sharma's picture

स्वार्थवादी शक्तियों को हराकर ही ब्राह्मण पुन: खोया प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकेगा

बड़ी विडंबना है कि आज ब्राह्मण चाहे चौक चौराहों पर मिलें, सामाजिक आयोजनों अथवा शादी विवाह जैसे पारिवारिक आयोजनों में मात्र यही चर्चा करते हैं कि क्या बताएं साहब ब्राह्मण पिछड़ता जा रहा है ।

राजनीति ने सवर्णों विशेषकर ब्राह्मणों को पीछे ढकेल कर पिछड़ों अल्पसंख्यकों एवं अन्य जातियों को आगे कर दिया है वे ब्राह्मणों को इस काबिल ही नहीं समझते उनकी समस्यायें सही ढंग से सुनी जाये और नही उनको समझने का समय किसी भी राजनीतिज्ञ के पास है ।

मेरे विचार से चर्चा यह होनी चाहिए कि ब्राह्मण क्यों पिछड़ रहा है ? उसके कारण जानना जरूरी है कि ब्राह्मणों के बच्चों में हीन भावना क्यों आ रही है ?  read more »

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