श्री भरत

श्री भरत की का चरित्र समुद्र की भांति अगाध, बुध्दि की सीमा से परे, लोक आदर्श का अद्भुत सम्मिश्रण तथा भ्रातृ प्रेम की सजीव मूर्ति थे । ननिहाल से अयोध्या लौटने पर माता द्वारा पिता के स्वर्गवास का दुखद समाचार मिलता है । वे इसके लिए अपने को बड़ा अभाता समझता है कि मुझे बड़े भैया श्रीराम को सौंपे बिना स्वर्ग सिधार गये ।

जब माता कैकयी के द्वारा श्रीम राम वनवास की बात बतायी जाती है तो श्री भरत काफी दुख से संतप्त होकर मां कैकेयी को क्रोध में लोभी, कलंकनी आदि भला बुरा कह डालता है । उन्होंने गुरू वसिष्ठ की आज्ञा से पिता जी की अन्त्येष्टि क्रिया संपन्न की । श्री भरत द्वारा सभी के बार बार कहने के उपरान्त भी उन्होने राज्य लेना अस्वीकार कर दिया तथा दल बल के साथ श्रीम राम को मनाने चित्रकूट चले गये । श्रृंगवेरपुर में पहुंचकर निषादराज को देखकर रथ का परित्याग कर दिया ।

प्रयाग पहुंचने पर भरद्वाज श्री भरत का स्वागत करते हुए कहते हैं कि आज मैं तुम्हें अपने बीच पाकर हमारे साथ तीर्थराज प्रयाग भी धन्य हो गये । भरत के समान शीलवान भाई इस संसार में मिलता दुर्लभ है । अयोध्या के राज्य की तो बात ही क्या, ब्रह्मा, विष्णु और महे्श का भी पद प्राप्त करके श्री भरत को जरा सा भी लोभ नहीं हुआ ।

भगवान श्रीराम से श्री भरत चित्रकूट में मिलकर अयोध्या लौटने का आग्रह करते हैं किन्तु भगवान श्रीराम अपने दिये गये वचनों पर अडिग रहते है । श्री भरत भगवान श्रीराम की चरण पादुका को लेकर अयोध्या लौट आते हैं । नन्दीग्राम में तपस्वी जीवन बिताते हुए श्रीराम के आगमन की चौदह वर्ष तक प्रतीक्षा करते हैं ।

श्रीराम भक्ति और आदर्श भ्रातृ प्रेम के अनुपम उदाहरण श्री भरत जी ही है ।

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