सूर्यदेव: विज्ञान सम्मत प्रत्यक्ष देवता

सूर्य विज्ञान समम्मत देवता है । सूर्यदेव ही लोकजीवन के साक्षी और सांसारिक प्राणियों की ऑंखों को प्रकाश देने वाले हैं । इसलिए, उनको लोकसाक्षी और जगच्चक्षु कहा गया है । निरूक्त के अनुसार वह आकाश में परिभ्रमण करने के कारण ही सूर्य की संज्ञा प्राप्त करते हैं । वही लोक को कर्म की ओर प्रेरित करते हैं तथा लोकरक्षक होने से ही रवि के नाम से उद्धोषित होते हैं ।

प्राचीन वैदिक ऋषि मुनि से आधुनिक वैज्ञानिक तक सूर्य के भौतिक एवं आध्यात्मिक गुणों से सम्यक्तया परिचित रहे हैं । इसलिए सूर्य से भावघनिष्ठ संपर्क स्थापित करने के निमित्ति उन्होंने सूर्योपासना को विश्वधर्म और संस्कृति का अनिवार्य अंग बना दिया । फलत: सूर्य सम्पूर्ण विश्व के लिए अधिष्ठातृदेव के रूप में अंगीकृत हो गये । रोग के जीवाणुओं के शमन के लिए तो सूर्यकिरणों की उपयोगिता चिकित्साशास्त्र सम्मत है । आरोग्य कामना, निर्धनता निवारण, सन्तति प्राप्ति आदि की दृष्टि से तो सूर्य की पूजा और उनके स्तोत्रों के पाठ का व्यापक प्रचलन है ।

कर्मकाण्ड और तन्त्राचार या आगमिक पध्दति में सूर्य को प्रथमपूज्य देव की प्रतिष्ठा प्राप्त है । सूर्य की अर्ध्य निवेदित करने के बाद ही दैवकार्य या पितृकार्य का विधान सर्वमान्य है । योगासनों में भी सूर्य नमस्कार का अतिशय महत्व है । इस प्रकार, सूर्य निस्सन्देह जागतिक जीवों के प्राणपोषक, सर्वसम्प्रदाय सम्मत, लोकतान्त्रिक अजातशत्रु देता है । शास्त्र पुराणों में ऐसा निर्देश है कि जो व्यक्ति प्रतिदिन सूर्य को नमस्कार करता है , वह हजार जन्मों में भी दरिद्र नहीं होता ।

प्रात:कालीन सूर्य जिस घर में शय्या पर सोये पुरूष को नहीं देखते, जिस घर में अग्नि और जल वर्तमान रहता है और जिस घर में नित्य प्रति सूर्य की दीपक दिखाया जाता है, वह घर लक्ष्मी पात्र होता है ।

इसके अतिरिक्त यह भी उल्लेख मिलता है कि आरोग्यकामी मनुष्यों को सूर्य की प्रार्थना करनी चाहिए । जिस प्रकार सूर्य की किरणों से सम्पूर्ण संसार प्रकाशित है, उसी प्रकार सूर्य की महिमा से समस्त विश्व वाङ्मय परिमण्डित है ।

यह सर्वज्ञात है कि जो देवता जितने महान् होते हैं उनकी उत्पत्ति की कथा भी उतनी ही चमत्कारपूर्ण होती है। पुराणों में वर्णित महामहिम देवता सूर्य की उत्पत्ति की कथा न केवल विचित्र है, अपितु इसमे सूर्य के वैज्ञानिक आयामों का भी रूपकात्मक विन्यास परिलक्षित होता है।

प्रजापति ब्रह्मा को जब सृष्टि की कामना हुई, तब उन्होंने अपने दांये ऍंगूठे से दक्ष की और बांये से उनकी पत्नी की सर्जना की । ब्रह्मा के पुत्र मरीचि का ही दूसरा नाम कश्यप

था । दक्ष की तेरहवीं कन्या के रूप में उत्पन्न अदिति के साथ कश्यप का विवाह हुआ । कश्यप के द्वारा स्थापित अदिति के गर्भ से भगवान सूर्य ने जन्म लिया । भगवान सूर्य से ही समस्त चराचर जगत का आविर्भाव हुआ । अदिति ने पहले सूर्य की आराधना की थी, इसीलिए वह अदिति के गर्भ से पुत्र के रूप में उत्पन्न हुए ।

ब्रह्मा के मुख से पहले ओम प्रकट हुआ । उससे पहले भू: भुव: और स्व: उत्पन्न हुए । यह व्याहृतित्रय की आदिदेव सूर्य क स्वरूप है । साक्षात परब्रह्मास्वरूप ओम् सूर्य का सूक्ष्म रूप है । फिर, उनके मह:, जन:, तप: और सत्यम् इन चार क्रमश: स्थूल से स्थूलतर रूपों का आविर्भाव हुआ । इस प्रकार भू:, भुव:, स्व मह:, जन:, तप: और सत्यम् आदि सूर्य की सप्तमूर्ति के रूप में प्रतिष्ठित है । आदितेज ओ के स्वभाव से जो तेज उत्पन्न हुआ वह आदितेज को ही सम्यक रूप से आवृत कर अवस्थित हुआ । और फिर बाद में ब्रह्मा के मुख से विनिर्गत ऋङमय यजुर्मय और साममय, अर्थात शान्तिक पौष्टिक और आभिचारिक तेज परस्पर मिलकर उक्त आद्य तेज ओं पर अधिष्ठित हुए । इस प्रकार, एकत्र तेजपुंज से विश्व में व्याप्त गंभीर अन्धकार नष्ट हो गया और सम्पूर्ण जड़ चेतन जगत सुनिर्मल हो उठा। दसों दिशाएं दिव्य किरणों की प्रखर क्रांन्ति से चमकने लगी । इस प्रकार ऋग्यजु: सामजनित छन्दोमय तेज मण्डलीभूत होकर, ओंकार स्वरूप परमतेज के साथ मिल गया और यही अव्ययात्मक तेज विश्व सृष्टि का कारण बना । अदिति से उत्पन्न होने के कारम सूर्य को आदित्य कहा जाता है, किन्तु मार्कण्डेयपुराण के अनुसार सृष्टि के आदि में उत्पन्न होने के कारण ही सूर्य को आदित्य नाम से संबोधित किया जाता है ।

ऋक, यजु: और साममय, अर्थात् शान्तिक, पौष्टिक और आभिचारिक तेज क्रमश: प्रात: मध्याह्न और अपरान्ह में ताप देते हैं । पूर्वान्ह के ऋक्तेज की संज्ञा शान्तिक है , मध्यान्ह का यजुस्तेज पौष्टिक और अपरान्ह या सायान्ह का सामतेज आभिचारिक है। सूर्य क तेज सृष्टिकाल में ऋङमय ब्रह्मा स्वरूप, स्थिति काल में यजुर्मय विष्णु- स्वरूप तथा संहारकाल में साममय रूद्र स्वरूप में प्रतिष्ठित रहता है । इसीलिए, सूर्य को वेदात्मा, वेदसंस्थित, वेदविद्यामय और परमपुरूष कहा जाता है । सूर्य ही सृष्टि, स्थिति और पळरय के हेतु एवं सत्तव , तम एवं रज गुणों के आश्रय हैं । ब्रह्मा , विष्णु और महेश इन तीन देवों के प्रतिरूप भी र्सू ही हैं, इसीलिए ये तीनों देवता सदा सर्वदा सूर्य की स्तुति करते रहते हैं ।

उपरिवर्णित परमतेजोमय सूर्य से जब संसार का अध: उऊर्ध्व और मध्य भाग सन्तप्त होने लगा, तब सृष्टिकर्ता ब्रह्मा भयत्रस्त हो उठे कि इस आदित्य से तो सम्पूर्ण सृष्टि ही भस्मसात हो जायगी । फलत:, ब्रह्मा सूर्य की स्तुति करने लगे । ब्रह्मा की प्रार्थना पर सूर्य ने अपना तेज कम कर लिया । तब ब्रह्मा ने समग्र चराचर जगत वन, पहाड़ नदी, मनुष्य पशु, देव, दानव, उरग आदि की विराट सृष्टि की । अदिति से देव, दिति से दैत्य तथा दनु से दाव उत्पन्न हुए । अदिति, दिति और दनु के पुत्र सारे संसार में फैल गये । देवों और दैत्य दानवों में भयंकर युध्द होने लगा । इस देवासुर संग्राम में देवपराजित हो गये । पराजित देवों की दीनता देख अदिति अपनी सन्तानों की मंगलकामना से सूर्य की उपासना करने लगी । तब भगवान सूर्य ने प्रसन्न होकर अदिति से कहा : मैं तुम्हारे गर्भ से सहस्रांशु होकर जन्म लूँगा और तुम्हारे पुत्रों के शत्रुओं का नाश करूँगा ।

सूर्य भगवान के सहस्रांश ने माता अदिति के गर्भ में प्रवेश करके अवतार रूप में अवस्थान किया । अदिति ने बड़ी सावधानी से पवित्र रहकर, कृच्छचान्द्रायण आदि व्रत पूर्वक, दिव्य गर्भ धारण किया । गर्भवती अदिति की कठोर तपश्चर्या देख कश्यप क्रुध्द होकर बोले :अरी नित्य निराहर व्रत करेक इस गर्भाण्ड को क्यों नष्ट कर रही हो ? अदिति के उत्तर में आस्था अनुस्वरित हुई । यह गर्भाण्ड नष्ट नहीं होगा, वरन यह शत्रुओं का विनाश करेगा । यह कहकर क्रोधाविष्ट अदिति ने देवरक्षक तेज: पुंज स्वरूप अपने गर्भाण्ड का परित्याग कर दिया। भूमिष्ठ गर्भाण्ड के तेज से सम्पूर्ण विश्व जलने लगा । कश्यप, सूर्य सदृश तेजस्वी उस गर्भ को देखकर प्राचीन ऋग्वेदोक्त सूर्य मंत्रों से उसकी विनम्र प्रार्थना करने लगे । उस गर्भाण्ड से रक्तकमल के समान कान्तिमान एक बालक प्रकट हुआ, जिसके तेज से सभी दिशाएँ समुद्भासित हो उठीं और तभी, घनगंभीर स्वर में आकाशवाणी हुई । हे कश्यप तुमने अदिति से कहा था कि क्यों गर्भाण्ड को मार रही हो, इसीलिए पुत्र का नाम र्मात्तण्ड होगा । यह समर्थ होकर सूर्य के अधिकार का कार्य करेगा और असुरों का विनाश करेगा ।

इस वचन को सुनकर परमहर्षित देवता आकाश से उतरे और दैत्य तेजोबल से हीन हो गये । पुन: देव दानवों में भीषण संग्राम हुआ, किन्तु र्मात्तण्ड के तेज से सभी असुर जलकर भस्म हो गये ।

इसके बाद प्रजापति विश्वकर्मा ने अपनी पुत्री संज्ञा का परमतेजस्वी र्मात्तण्ड के साथ विवाह कर दिया। संज्ञा से र्मात्तण्ड की तीन सन्ताने दो पुत्र वैवस्वत मनु और यम और एक कन्या यमुना उत्पन्न हुई । परन्तु र्मात्तण्ड बिम्ब का अखिलभुवनतापकारी तेज संज्ञा के लिए असह्य हो गया । तब वह अपनी छाया को अपनी जगह रखकर पिता विश्वकर्मा के घर चली गई । छाया से भी सूर्य ने तीन सन्ताने दो पुत्र और एक कन्या उत्पन्न की । वैवस्वत मनु के तुल्य बड़ा पुत्र सावर्णि के नाम से प्रसिध्द हुआ । दूसरा पुत्र शनैश्चर नामक ग्रह हुआ और पुत्री का नाम तपती रखा गया । तपती को महाराज संवरण विवाह के निमित्त अपने साथ ले गये । छाया अपने बच्चों से जैसा प्यार करती थी, वैसा प्यार सौतेली सन्तानों को नहीं दे पाती थी । छाया के अपराध को वैवस्वत मनु ने तो सहन कर लिया किन्तु यमराज से नहीं सहा गया । वह सौतेली माँ पर चरण प्रहार करने को उद्यत हुआ । फलत: माँ के अभिशाप से उसके पैर गिरकर नष्ट हो गये। पैरों से मन्दगति होने के कारण ही उसे शनैश्चर (धीरे चलने वाला) कहा गया । इसीलिए कहा गया है अन्य अभिशाप का प्रतिकार तो है, किन्तु माँ के अभिशाप का कोई प्रतिकार नहीं है ।
संज्ञा के विरह से व्याकुल सूर्य ने अपना तेज क्षीण करने को अपने श्वसुर विश्वकर्मा से आग्रह किया । सूर्य की आज्ञा से विश्वकर्मा उनके मण्डलाकार बिम्ब को चाक (सान) पर चढ़ाकर तेज घटाने (खरादने) के लिए उद्यत हुए । शाकद्वीप में सूर्य चाक पर चढ़कर घूमने लगे । चक्रारूढ़ सूर्य के परिभ्रान्त होने से सकल चराचर जगत में उथल पुथल मच गई । पहाड़ फट गये, पर्वत शिखर चूर्ण विचूर्ण हो गये । आकाश पाताल और मर्त्य तीनों भुवन आकुल व्याकुल हो उठे । इस प्रकार, विश्व विध्वंस की स्थिति उत्पन्न हो गई । सभी देवी - देवता भयाकुल होकर सूर्य की स्तुति करने लगे ।

विश्वकर्मा ने सूर्यबिम्ब के सोलह भागों में पन्द्रह भागों को रेत डाला । फलत: सूर्य का शरीर मृदुल मनोरम कान्ति से कमनीय हो गया । विश्वकर्मा ने सूर्यतेज के पन्द्रह भागों से विष्ण के चक्र, महादेव के त्रिशूल, कुबेर की शिबिका, यम के दण्ड और कार्तिकेय के शक्तिपाश की रचना की एवं अन्यान्य देवों के प्रभाविशिष्ट विभिन्न शस्त्रास्त्र भी बनाये । सूर्य के मंजुल कान्तिमान शरीर को देखकर संज्ञा परम प्रसन्न हो
उठी । इस प्रकार, सूर्य की उत्पत्ति कथा थोड़े बहुत रूपान्तरों के साथ विभिन्न पुराणों मे ंवर्णित है । उपर्युक्त कथा अधिकांशत: मार्कण्डेयपुराण पर आधृत है । यों भविष्यपुराण (ब्राह्मपर्व), वराहपुराण (आदित्योत्पत्ति अध्याय), विष्णु पुराण (द्वितीय अंश), कूर्म पुराण (चालीसवां अध्याय), मत्स्यपुराण (अध्याय संख्या एक सौ एक), ब्रह्मावर्ैवत्तपुराण (श्रीकृष्ण खण्ड) आदि में भी सूर्य की उत्पत्ति कथा और उनके महात्म्य आदि विशदतापूर्वक मनोरंजक कथाओं और उपकथाओं के साथ वर्णित हुए हैं । इसीलिए समग्र संसार, अग्नि सोमात्मक प्रत्यज्ञ विज्ञान देवता, जिसके बिना विश्वका अस्तित्व सम्भव नहीं, तेजोधाम सूर्यदेव की प्रार्थना में नतशीर्ष है ।

यस्य सर्वमयस्येदमङ्गभतं जगत्प्रभो ।
स न: प्रसीदतां भास्वान् जगतां यश्च जीवनम् ॥
यस्यैकभास्वरं रूपं प्रभामण्डलदुर्दृशम् ।
द्वितीयमैन्दवं सौम्यं स नो भास्वान् प्रसीदतु ॥
ताभ्यां च यक्य रूपाभ्यामिदं विश्वं विनिर्मितम् ।
अग्नीसोममयं भास्वान् स नो देव: प्रसीदतु ॥
(मार्कण्डेयपुराण: 109, 72-74)

डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव
कंकड़वाग, पटना (बिहार)