अन्नकूट गोवर्धन पूजा

कार्तिक शुक्ल प्रतिदिन को गोवर्धन अन्नकूट और बलिराज नाम से पुकराते है। दिन भगवान श्री कृष्ण ने इंद्र के स्थान पर गोवर्धन की पूजा को प्रारंभ किया था इससे कुपित होकर इंददेव ने मूसलाधार जल बरसाया था इससे कुपित होकर इंद्रदेव ने मूसलाधार जल बरसाया था और श्री कुष्ण जी ने गोप और गोपियों को बचाने के लिए अपनी कनिष्टि पर गोवर्धन पर्वत को उठाकर इंद्र का मानमर्दन किया था उनके ही स्मरण के लिए गोवर्धन और गौ का पूजन होता है।

अन्नकूट गोवर्धन पूजा के निर्मित आज के दिन श्री कृष्ण ने पके हुये अन्नकूट लगा दिये इसलिए इस दिन का नाम अन्नकूट भी पड़ा।

अन्नकूट गोवर्धन के दिन स्नान करन से पूर्व तेलाभ्यग करना आवश्‍यक है। दिन में गोवर्धन पूजा कर रात्रि को भूमि में पांच प्रकार के रंगों से बलिराज की मूर्ति बनाकर उसके समीप ही आर्य विंध्यवासिनी कामी सर्वाभरण भूशिता मूर्ति बनानी चाहिए तदन्तर अपने कुटुम्ब के साथ बैठकर गंधाक्षत , पुष्प तथा कमल के हारें से पूजा करें।

इस प्रकार अन्नकूट गोवर्धन पूजा करके कीर्तन और भजनों द्वारों रात्रि में जागरण करें पूजा के अंत में यथाशक्ति इक्कीस एक सौ एक हजार दीपकों के प्रकार को कौमुदी महोत्सव कहते है इस दिन जो भाव से रहता है वह वर्ष पर्यत उसी प्रकार रहता है यदि आज के दिन दुखी है तो वर्ष भर दुखी रहेगा इसलिए मनुष्य को प्रसन्न होकर इस उत्सव का मनाना चाहिए