एक मुलाकात - श्री रामू प्रसाद शर्मा

वर्तमान में छत्तीसगढ़ में ब्राह्मणों में एकता के विषय में संक्षिप्त रूप में अपना मत देते हुए श्री रामू प्रसाद शर्मा श्रीयूपारीण ब्राह्मण समाज के कार्यकारी महासचिव ने कहा कि विगत 30 वर्षों से सामाजिक संगठनों में कार्य किया किन्तु मेरा अनुभव कहता है कि एकता संभव नहीं है । इसका सबसे बड़ा कारण है अहंकार जिसे कोई भी त्यागना नहीं चाहता अहंकार किसी न किसी रूप में हरेक ब्राह्मण में है ।

सामाजिक समन्वय के दिशा में प्रयास समय-समय पर हुआ किन्तु सफलता नहीं मिली । सन 2001 में सरयूपारिण ब्राह्मण समाज का सम्मेलन भी रखा गया किन्तु मुझे लगा कि सभी कोई पद में रहना चाहते हैं हम लोगों ने सामाजिक एकता के लिए म.प्र. राज्यके समय एक छोर से दूसरे छोर तक गांव-गांव घर घर जाकर सामाजिक एकता के दीप जलाने का प्रयास किया जिसका श्रेय आज भी लोग मुझे देते हैं और याद करते हैं । 16 वर्षो तक छत्तीसगढ़ी ब्राह्मण समाज के विभिन्न पदों में रहकर समाज सेवा कार्य किया । निर्विवाद रूप से मैंने कार्य को प्रथम प्राथमिकता दी , पद को नहीं ।

मुख्य समस्या हम स्वयं एक नहीं है । छत्तीसगढ़ी समाज के ही दो अलग अलग संगठन है सामाजिक एकता हेतु छ.ग. में जितने भी ब्राह्मण 100 वर्षों से निवासरत है उनकी एक यूनिट बनाई जाय या छत्तीसगढ़ी ब्राह्मणों को लेकर एक संगठन बनाया जाय नाम चाहे कुछ भी रखा जाय किन्तु यह असंभव लगता है हम एक झूठा स्वाभिमान लेकर अपना अस्तित्व बनाये रखना चाहते हैं ।

मेरा मानना है गैर छत्तीसगढ़िया राजनैतिक दृष्टि से या सामाजिक एकता का सहारा लेकर हमसे जुड़ना चाहते हैं एक नम्रता की आड़ में । हम कभी देश जाने की बात नहीं करते किन्तु वर्षों से जो यहां आकर रह रहे हैं वे आज भी देश जाने की बात करते हैं उनकी निष्ठा आज भी छत्तीसगढ़ के प्रति नहीं है ।

राजनैतिक दृष्टि से गैर छत्तीसगढ़ी ब्राह्मण अपने को निर्बलता अक्षता की स्थिति में ही वे समझौते करते हैं । वे आज भी अपने पढ़े लिखे होनहार लड़के की शादी छ.ग. ब्राह्मण के यहां न कर अपने प्रदेश की ही लड़की समाज से करते हैं और लड़की सामान्य है तो उसके लिये यहां रिश्ता करने तैयार हो जाते हैं यह मतभेद दूर हो जाने से भी सामाजिक एकता का कारक बन सकती है । सुनियोजित ढंग से सभी को समान रूप से सम्मान जनक रूप में साथ लेकर चलने में सामाजिक एकता की दिशा में सार्थक पहल किया जा सकता है ।

समाज में युवाओं का ध्यान वर्तमान में अपने व्यक्तित्व भविष्य की ओर अत्यधिक है वे रोजगार और स्वरोजगार को प्राथमिकता देते हैं । पहले गांव घर में पारिवारिक सम्पत्ति खैती किसानी हुआ करता था जो कि आय में सहायक हुआ करती थी जो आज उपलब्ध नहीं है । इस गंभीर समस्या के कारण आज युवा वर्ग अपने में सीमित हो गया है और कुण्ठाओं से ग्रसित हो गये हैं । जिस कारण से सामाजिक गतिविधियों में उनका कोई रूझान या रूचि नहीं है । वर्तमान में युवाओं का ध्यान केवल पद और धन की ओर ही है ।