काट जगत तिमिर पाश । न रहें रंचमात्र संत्रास ॥
अन्तस भर नव उच्छवास । बंदनवार सजे धरा आकाश ॥
शुभ्र ज्योत्स्त्रा दे ज्योति मालिके । जग आलोकित हो दीप वर्त्तिके ॥
नही उजास अभी तक कुटियों में । व्यथा दंश बूढ़ी भुकृटियों में ॥
खेतों खलिहानों के खोये उल्लास । सोये अतृप्त यौवन का मधुमास ॥
शरत् चन्द्रिका बन धवल रन्ध्रिके । जग आलोकित कर दीप वर्त्तिके ॥
न रहे याचना इस बार । खुशियों को ही जय यजकार ॥
संकल्प शक्ति दृढ़ मन में भर । लक्ष्य मार्ग स्थित पग धर ॥
अध, ऊर्ध्व, चतुर्दिक चलके । जग आलोकित हो दीप वर्त्तिके ॥
लक्ष्मी को प्रसन्न करिए