15 अगस्त 1947 देश आजाद हुआ, आजादी के दीवानों में मंगल पाण्डेय , राजगुरू, भगत सिंह , चंद्रशेखर आजाद की बलिदान के नीव पर महात्मा गांधी के आदर्शों सत्य अहिंसा एवं अनुशासन के साथ गर्म नौजवानों के जो रक्त अंग्रेजी हुकुमत को भारत छोडऩे मजबूर कर दिया, लेकिन यह एक राजनैतिक सौदा था जिसके पीछे अंग्रेजों की एक घृणित चाहत थी जिसकी नींव वे पहले रख चुके थे । उन्होंने हमें फूट डालो और राज करने अनुशासनहीनता , नौकर मानसिकता वाली शिक्षा एवं आरक्षण का कोढ़ उपहार में दिया जिसे लेकर हमने समाज का निर्माण प्रारंभ किया वास्तव में स्वतंत्रता आंदोलन के पूर्व की राजनैतिक अनुशासन में निरंतर गिरावट होती जा रही है । आज हमारा राजनेतृत्व जनमानस को प्रभावित करने तथा सांस्कृतिक परंपराओं के परिष्कार में महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली भूमिका निभा सकता हैं । राजनेतृत्व कुरीतियों को मिटा सकते हैं । और बड़ी आसानी से एक वैज्ञानिक समाज का निर्माण कर सकते हैं । जनमानस को इस दिशा में कार्य करने प्रेरित कर सकता है पारदर्शिता के जरिये भ्रष्टाचार का समापन कर सकता है । वास्तव में जिन आदर्शों और मानवीय मूल्यों को राजनीतिज्ञों की ओर से समर्थन नहीं मिलता है वे व्यवहार की दृष्टि से बेमानी और केवल पुस्तकीय बनकर रह जाते हैं ।
वर्तमान की लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में जनसामान्य अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्र और उन्मुक्त हुआ है । अगर नेतृत्व ईमानदार और आदर्शवादी है तो समाज का बड़ा हिस्सा वैसा ही होता है । विश्वभर में लोगो ंके बीच सांस्कृतिक विकृति तेजी से फैल रही है । धर्म गुरू और शिक्षक भी नैतिक मूल्यों से परे हट रहे है ं। ाज राजनेता भी नेतृत्वकर्ता कम ठेकेदार ज्यादा हो गये हैं ष राजनीति में आज कर्मठ और जनसेवको ंकी जगह राजनीति को व्यवसाय मानने वाले व्यक्तियों ने ले ली है । चुनाव जीतना एक युद्ध बन गया है । ये ठेकेदार कैसे भी चुनाव जीतना चाहते हैं तथा इन राजनीतिज्ञों का उद्ेदश्य सिर्फ सत्ता सुख प्राप्ति एवं स्वार्थ सिद्धि तक ही सीमित हो गया है । ये लोगों को भावनात्मक रूप से वरगलाने में ये माहिर हैं । उनके लिए जातिगत और सांप्रदायिक दंगे कराना सिर्फ वोट कबाडऩे का एक अच्छा तरीका बन गया है । जनता को निरक्षर बनाये रखना उनकी सफलता है । आज के नेता धर्म गुरूओं का चोला पहन के हिंसा का उपदेश दे रहे हैं । झूठ, छल कपट उनकी नीति है. निश्चित रूप से आज के नेता नेतृत्वकर्ता का दर्जा खोते जा रहे हैं । हमारे सामने संकट है कि गांधी , नेहरू जे.पी. और विनोबा की तस्वीर के साथ आज के किस नेता की तस्वीर रखे यह सामाजिक और सांस्कृतिक संकट है । ऐसी विषम और दिशाहीन राजनैतिक स्थिति में आज के नेता अपना सामाजिक और सांस्कृतिक दायित्व से पीछे हटे हैं नेता देश को धर्म और जाति के आधार पर बांटने के प्रयासों को विराम दे नहीं तो आने वाली युवा भारत की पीढ़ी उन्हें उखाड़ फेंकेगी अब यह सब कुछ समझ रहे हैं कि कि, तरह उसका भविष्य अंधकार मय हो रहा है । योग्यता की पूछ की जगह आरक्षण के 5-10 प्रतिशत अंक प्राप्त करने वाले अयोग्य उम्मीदवारों ने ले ली है । इसीलिए देश के सामाजिक राजनैतिक भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ आंदोलनों को बड़ी सफलता मिल रही है ।
स्वतंत्रता की इस बेला में आईये हम देश को अनुशासित, योग्य बनाने की दिशा में कार्य करें और भ्रष्ट तंत्र का स्थान लेने के योग्य देशभक्त युवा नागरिक के निर्माण के दिशा में कार्य करें ।
हेमन्त तिवारी
सदस्य संपादक