भारत की संस्कृति में तीन शब्दों में व्यक्त करना है तो कह सकते हैं कि हमारी संस्कृति है अर्पण, तर्पण और समर्पण । तीनों में त्याग है और यह त्याग कर्तव्य रूपी है, उपकार रुपी नहीं । अर्थात त्याग करके हम किसी पर उपकार नहीं करते । समाज के लिए किया गया त्याग अर्पण हैं, पितरों के लिए माता-पिता के लिये किया गया त्याग तर्पण है और भगवान के लिए किया गया त्याग समर्पण कहलाता है । इनमें ज्यादा महत्वपूर्ण समाज के लिए किया जाने वाला त्याग है, क्योंकि वह हमारा कर्तव्य है और समाज सुधार का पहला मंत्र है।
जिस समाज में हम रह रहे हैं, जिस समाज में रहकर हम धन और यश कमाते हैं, उस समाज के लिए अवश्य ही कुछ समाज सुधार कार्य करना चाहिए । स्कूल कॉलेज बनवाएं धर्मशाला, मंदिर बनाएं, अन्य क्षेत्र में कुछ दान दें, गरीब विद्यार्थियों के लिये छात्रवृत्ति, यूनिफार्म, पढऩे के लिये किताबें दे । रक्त दान, नेत्र दान, अन्न दान, शिक्षा दान यह सब करना चाहिए, क्योंकि यह हमारा कर्तव्य है । भगवान ने अगर हमें सामर्थ्यवान बनाया है तो हमें दान करना ही चाहिए ।
जहां तक कर्तव्य की बात है तो कर्तव्य कार्यक्रम में भी फर्क है । एक है कर्तव्य कर्म और एक निषिद्ध कर्म, कर्तव्य कर्म वह है जिसे करने से पुण्य नहीं मिलता, लेकिन न करने से पाप लगता है । इसलिए निषिद्ध कर्मों से बचो । वे कर्म न करो, उन्हें नहीं करोंगे तो पुण्य नहीं होने वाला लेकिन करोगो तो पाप जरूर होगा । इसलिए निषिद्ध कर्म से बचते हुए कर्तव्य कर्म करते रहो । जिस माता- पिता ने हमें पाल पोष कर बड़ा किया , पढ़ाया लिखाया विवाह किया, उन मां बाप की सेवा करना हमारा कर्तव्य कर्म है । ऐसा करके हम माता पिता पर कोई उपकार नहीं कर रहे हैं, लेकिन जो ऐसा नहीं करते उन्हें पाप जरूर
लगेगा । समाज सुधार कर्तव्य कर्म सबसे बढ़ा है।
अपने पितरों के लिए अपने मां बाप के लिये त्याग करो । यह तर्पण है । मां बाप के लिये धन संपत्ति और समय में भी हिस्सा निकाले । कई लोग धन कमाने में इतना लगे रहते हैं कि उनके पास बीमार मां बाप के पास बैठकर यह पूछने का समय तक नहीं होता कि आप कैसे हैं ? कभी सोचा है कि अगर मां तुम्हारे लिए समय न निकालती तो तुम इतने बड़े कैसे होते ?
पैसा जरूरी है जीने के लिए हमारे ऋषियों ने अर्थ को चार पुरूषार्थों में स्थान दिया है लेकिन ध्यान रहे कि पैसा साधन है, जीवन का साध्य नहीं । समाज में आज जितनी भी बीमारियां दिखाई देती है अनीति, भ्रष्टाचार व पापाचार सबके मूल में एक ही भूल है हमने पैसे को साधन मानने की जगह साध्य मान लिया है । आज समाज सुधार में शुध्द साधन का प्रतिपादन सबसे बढ़ा कार्य है।
सच है कि अगर जीना आता तो सुख तो झोपड़ी में भी मिल जाता पर अर्पण, तर्पण और समर्पण की नीति को कभी नहीं छोड़ो, क्योंकि सुख तो इसी नीति से आता है । ब्राह्मïण युवा होने के नाते समाज की आंखे हम पर लगी रहती है वे हमारा अनुसरण करते हैं और आज हमारे समाज में ही सबसे ज्यादा नैतिक पतन आया है हम ही अर्पण-तर्पण और समर्पण के हमारे पूर्वजों के बनाये रास्ते से भटकते जा रहे हैं । वेदों का ज्ञान और पाठ अनिवार्य है । हमारी शिक्षा को आधुनिक युग में आत्मसात करना होगा । समाज में क्रान्त लाने , समाज सुधार के अगुवा बनना होगा । अर्पण- तर्पण-समर्पण के नीति को आत्मसात करना होगा ।
- हेमन्त तिवारी सदस्य संपादक