माघ पूर्णिमा पर मेले अनेक

माघ पूर्णिमा पर पड़ने वाले विभिन्न रंग-बिरंगे मेले अपनी अद्भुत छटा बिखेरते है । इन मेलों में प्रमुख है, राजिम का माघ मेला जो अब रुप लेता जा रहा है । इसके अतिरिक्त माघ पूर्णिमा पर आयोजित होने वाले और भी कई मेले हैं ।

राजिम का कूंभ स्वरुप मेला - राजिम में माघ पूर्णिमा से महाशिवरात्रि तक मेला आयोजन की परंपरा अत्यंत प्राचीन समय से रही है । छत्तीसगढ़ राज्य के अस्तित्व में आने के बाद सन्2005 ङ्खह्न की माघ पूर्णिमा से महाशिवरात्रि की अवधि तक आयोजित पर्व को राज्य सरकार ने कूंभ सदृश्य आयोजन का स्वरुप दिया । इस आयोजन में देश के भिन्न-भिन्न हिस्सों से संतो का आगमन होता हैं राज्य शासन ने देश के विभिन्न अखाड़ों, अलग-अलग पंथों के साधुओं के संगठनों, और उनके प्रमुखों, महामंडलेश्वरों, महंतो से संपर्क कर उन सबकी सन्मति से2006 के राजिम के धार्मिक एवं आयोजन को राजिम पुं भ महोत्सव के रुप में आयोजित किया । पिछली बार माघ पूर्णिमा के अवसर पर ब्रह्ममुहुर्त में दो लाख से अधिक लोगों द्वारा स्नान, देवर्घअर्पण, चित्रोत्पला पूजन, दीपदान ताि देवदर्शन, पूजन-अर्चन किया गया ।

सिहावा कर्णेश्वर मेला - महानदी का उद्गम स्थल सिहावा, धमतरी जिले से 60 कि.मी. की दूरी पर स्थित है । श्रृंगी पर्वत पर एक कूंड से महानदी का उद्गम स्थल माना जाता है । यहीं से महानदी धारा के रुप में नीचे जाती है । पास में ही प्राचीन मंदिर कर्णेश्वर स्थित है । इसी के प्रागंण में माघ पूर्णिमा पर मेला भरता हैं आस-पास के श्रध्दालु महानदी में स्नान कर शिव की अर्चना करते हैं । आमतौर पर मड़ई अलग होती है और मेला अलग लेकिन सिहावा ही छत्तीसगढ़ का ऐसा सांस्कृतिक स्थान है, जो इस मामले में सबसे भिन्न है । वहां एक ही समय में मड़ई और मेला दोनों होते है । आमतौर पर किसी भी गांव में मड़ई की संख्या पांच-सात हो सकती है ।लेकिन सिहावा में मड़ई की संख्या दो से तीन सौ तक होती है ।

रुद्री मेला - धमतरी से 5 कि.मी. दूर महानदी के तट पर स्थित प्राचीन शिव मंदिर है । यहां भी हर वर्ष माघ पूर्णिमा पर मेला भरता है । आस-पास के ग्रामीण नदी में स्नान कर शिव को अर्ध्य अर्पित कर मेले में शामिल होते हैं । मेले में रग-बिरंगी वस्तुओं से दुकानें सजती है । बड़ी संख्या में लोग यहां आकर मिलते हैं लिहाजा कई बार रिश्ते भी यही तय हो जाते हैं ।

नारायणपुर की मड़ई - नारायणपुर बस्तर के अंतागढ़ के पास स्थित तहसील है । यह क्षेत्र अब अर्धकूंभ के अंतर्गत आता हैं। नारायणपुर अबूझमाड़ क्षेत्र के सात परगनों सहित कुल पच्चीस परगनों में विभाजित हैं परगनों का विभाजन गोत्रों के आधार पर हुआ है । हर परगना के अपने देवी-देवता होते हैं । लेकिन प्रमुख देवी दंतेश्वरी देवी हैं । नारायणपुर में प्रत्येक वर्ष मावली माता (दंतेश्वरी देवी) के सम्मान में मड़ई भरती है । माघ की पूर्णिमा से मड़ई प्रारंभ होकर चैत्र की नवमी तक चलती हैं मड़ई के अवसर पर एक सुनिश्चित स्थान पर मखली यात्रा को स्थापित कर दिया जाता है । इनके साथ ही हर परगने से आई देवियों को भी स्थापित किया जाता है । देवियों के ध्वज लहराने और उन्हें स्थापित करने के पूर्व इनकी पूर्ण विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है । देवी को प्रसन्न करने के उद्देश्य से माड़िया और मुरिया लोग घेरा बनाकर रात भर कोरेंग, एंदालतोर, नृत्य करते हैं । फिर मेले में सजी दुकानों से खरीददारी करते हैं ।

बानबरद मेला - दुर्ग जिले के भिलाई से 15 कि.मी. दूर और अहिवारा से 3 कि.मी. दूर तक प्राचीन ग्राम बानबरद है । यहां भगवान श्री नारायण की मूर्ति है और एक छोटा सा कूंड है । ऐसे किसी व्यक्ति से जाने-अनजाने गो-हत्या का पाप हो गया हो, उसके प्रायश्चित के लिए बानबरद के इस कूंड में स्नान कर भगवान विष्णु की पूजा का विधान है । आमतौर पर बानबरद में माघ पूर्णिमा को मेला लगता हैं इस मेले में दुर्ग जिले के और दूरस्थ अंचल के लोग काफी बड़ी संख्या में आते हैं । यहां के कूंड में स्नान का काफी महत्व है ।

नर्मदा मेला - राजनांदगांव जिले के गंडई कस्बा से 6 कि.मी दूर दक्षिण में स्थित है नर्मदा । इस अंचल विशेष का मेला और स्थानीय लोगों की आस्था और श्रध्दा का केंद्र बिंदु नर्मदा कूंड हैं । जहां गर्म जल की धारा अनवरत प्रवाहित हो रही है । इस कूंड के किनारे नर्मदा देवी का मंदिर है । नर्मदा का प्रसिध्द मेला प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा को तीन दिनों तक भरता है । जहां लोग हजारों की संख्या में नर्मदा स्नान और नर्मदा मैया के दर्शन के लिए आते हैं । यहां जरुरतों की चीजों से लेकर कलात्मक वस्त्राभूषण भी बिकने के लिए आते हैं । इसके अतिरिक्त दुर्ग जिले के मोंहदी में माघ पूर्णिमा का मेला लगता है । सरगुजा में कई स्थानों पर पौष पूर्णिमा पर भी मेला लगता है । शिवरीनारायण में माघ पूर्णिमा और महाशिवरात्रि पर मेला भरता है । मेला और मड़ई लोक जीवन के अभिन्न अंग है । इनसे सामाजिक समरसता भी बढ़ती है ।