कविता

पं. संजीव ठाकुर का सम्मान

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जम कर होगी जंग शुरू

घर घर मे होगी बन्दूकें
जेबों में बम्ब भरे होंगे,
आकाश से बारूद बरसेगा
खेतों में तीर उगे होंगे ,
नन्हें मुन्हे बच्चों के
हाथों में होंगे हथगोले
झांसी कीरानी की गाथा
फिर से गायेंगे हरबोले
फिर से आयेंगे भगत सिंग

तीन कविताएं ...

कहीं हम भूल न जाये
इतिहास खुद का
कहीं हम कर न डालें
उपहास खुद का
आनंद शोध का विषय तो
स्वयं विप्र है
कहीं हम खो न दे
विश्वास, खुद का ।

पं. संजीव ठाकुर को मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार

पं. संजीव ठाकुर को भव्य समारोह में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह द्वारा '00म/- शॉल तथा श्रीफल से सम्मानित कर प्रथम अखिल भारतीय मैथिलीशरण गुप्त साहित्य पुरस्कार प्रदान किया गया , यह पुरस्कार अखिल भारतीय गहोई वैश्य समाज द्वारा स्थापित किया गया है। यह सम्मान व पुरस्कार पं.

होली में

नहीं मिलते, जिन्हें हम खोजते फिरते हैं, होली में,

हमारा दिल चुरा कर रख लिया है अपनी चोली में,

नहीं परवाह उन को है क हम पर क्या गुजरती है,

इसे वे बेरहम हंस कर उड़ा देते ठिठोली में,

खबर उन को नहीं शायद कि हम शैतान हैं ऐसे,

नववर्ष शुभकामना कविताएँ व रचनाऐं

शीर्षक एक बात अनेक
नववर्ष
नवयुवकों के लिए नई चेतना का
निर्दोषों के लिए न्याय का
नववधू के लिए सुखमय
वैवाहिक जीवन का हो ।

नववर्ष

दीप वर्तिक

काट जगत तिमिर पाश । न रहें रंचमात्र संत्रास ॥
अन्तस भर नव उच्छवास । बंदनवार सजे धरा आकाश ॥
शुभ्र ज्योत्स्त्रा दे ज्योति मालिके । जग आलोकित हो दीप वर्त्तिके ॥

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