हिन्‍दी कविता

गड्ढे में गिरती जिन्दगियाँ

कुरुक्षेत्र के प्रिंस ने बाजी मारी ।
रायसेन के विनय की जिन्दगी गड्ढे के आगे हारी ।
रतलाम के कालु के लिए भी गड्ढा बना शिकारी ।

अब आई झांसी के अवधेश की पारी ।
क्या हर बच्चा गड्ढे में गिरगा बारी-बारी ।
कौन लेगा इन सब वारदातों की जिम्मेदारी ।

होली में

नहीं मिलते, जिन्हें हम खोजते फिरते हैं, होली में,

हमारा दिल चुरा कर रख लिया है अपनी चोली में,

नहीं परवाह उन को है क हम पर क्या गुजरती है,

इसे वे बेरहम हंस कर उड़ा देते ठिठोली में,

खबर उन को नहीं शायद कि हम शैतान हैं ऐसे,

जिन्दगी बहती नदी – हिन्‍दी गज़ल

तलाशती है राहें, यदि संभावनाएँ ।
शुभकामनाओं के दिये, हम क्यों न जलाएँ ॥

भूलकर अंधियारों के सारे सितम ।
अवरोध पथ के हम हटाएँ ॥

क्या हुआ यदि नीड़ का बिखरा हो तिनका ।
नए सपनों का घर फिर हम सजाएँ ॥

नववर्ष शुभकामना कविताएँ व रचनाऐं

शीर्षक एक बात अनेक
नववर्ष
नवयुवकों के लिए नई चेतना का
निर्दोषों के लिए न्याय का
नववधू के लिए सुखमय
वैवाहिक जीवन का हो ।

नववर्ष

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